रंगों का त्योहार होली आई रे , भक्तों के जीत का दस्तक (फीचर)
- by Admin (News)
- Mar 29, 2021
होली उमंगो का त्योहार है , रंगों का त्योहार है , विचार के आदान - प्रदान और भाईचारे , सौहार्द , एकता की भावना रंग बिरंगे रंगों से सावन बरसाकर गले मिलकर पुरानी दुश्मनी मिटाने व नयी भावना व प्रेम को मन में जगाने का एक बहुत हीं खुबसूरत व खुशियों से भरा त्योहार है |
ना उम्र का फासला न जन्म का बंधन , उल्लासपूर्ण बड़े व बच्चे सभी जाती धर्म से कहीं ऊपर उठकर , एक दूसरे के साथ मिलजुल कर लोग इस त्योहार का आंनद उठाते व मनाते है |
इस त्योहार को हम होली उत्सव का भी नाम दे सकते हैं | अलग नजर से देखी जाए तो यह त्योहार सामाजिक एकता का सबसे बड़ा पर्व कहा जा सकता है | चूकि यहाँ इस वक्त न कोई स्वामी है और नाहीं सेवक , सभी प्रकार के भेदभाव को मिटाकर एक साथ सारा समाज होली के रंग में रंग जाता है | सामाजिक , धार्मिक व देशभक्ति त्योहार है "होली" |
वैसे तो वसंत पंचमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है | सरसों के फूल खिलते हीं होली के भी आगमन का संकेत मिलना शुरू हो जाता है | अम्रमंजरियों पर भ्रमरावलियां मंडराने लगती है | प्रकृति में एक सुन्दरता का अनुभव होने लगता है | इस तरह होली का त्योहार आते हीं नए रौनक , नई उत्साह एवं उमंगो की लहरे दिखाई देने लगती है |
वैसे इस त्योहार को होलिका यज्ञ भी कहा जाता है | इस दिन नए आनाज को यज्ञ में हवन हेतु प्रदान करने का भी परम्परा है | उस अन्न को होला कहते है इसलिए इसका नाम होलिकात्सव परा है | होलिकात्सव मनाने के बारे में अनेक कथा प्रचलित है |
मानने को तो ऐसी मान्यता है की इस त्योहार का संबंध काम दहन से भी जुड़ा है |भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्री से कामदेव को भस्म कर दिया था तभी से इस त्योहार का प्रचलन शुरू हुआ | फाल्गुन मास की पूर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता है | होली के साथ अनेक कथायें जुड़ी हुई है | होली का उत्सव मनाने के एक रात पहले होलिका दहन जलाया जाता है | होलिका दहन का किस्सा भगवन विष्णु के भक्त प्रह्लाद की जिंदगी और उनकी बुआ होलिका से जुड़ा है |
भक्त प्रह्लाद के पिता हरिण्य कश्यप स्वयं को भगवन मानते थे , वह भगवान विष्णु के विरोधी थे जबकि उनका लड़का प्रह्लाद विष्णु भगवन की भक्ति में सदा तल्लीन रहता था | हरिण्य कश्यप प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति करने से रोका , लाख कोशिश के बाद भी प्रह्लाद उनकी बात को न मानी तो उन्होंने प्रह्लाद को जान से मारने की साजिश रच डाली और इसके लिए उन्होंने अपनी बहन होलिका की मदद ली जिसे ईश्वरीय शक्ति के रूप में एक ऐसी चादर प्रदान की गई थी जिसको शरीर पर रखने या ओढ़ने वाला व्यक्ति या प्राणी अग्नि के प्रभाव से बच सकता है | जलना तो दूर की बात है अग्नि उसे छू भी नहीं सकती थी |
होलिका हवन कुंड में प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठ गई , दैवीय शक्ति या फिर ईश्वरीय चमत्कार ऐसा हुआ की होलिका के बदन से चादर सरक कर प्रह्लाद से लिपट गया | होलिका आग में जलाकर भस्म हो गई परन्तु भगवन विष्णु के आशीर्वाद से भक्त प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ | भक्त की विजयी हुई और राक्षस की पराजय | उस दिन सत्य से असत्य का तराजू ऊपर उठा और भक्त प्रह्लाद की भावना भारी पड़ी | तब से लेकर आज तक होलिका दहन की स्मृति में होली का त्योहार मनाया जाता है |
यह सिर्फ कहानी मात्र नहीं है जो प्रति साल हम सुनते या मानते है | इस कहानी से हमें बहुत बड़ी सीख भी मिलती है व बुराई पर अच्छाई की जीत का सेहरा भी बंधता नजर आता है | घमंड या फिर ईश्वरीय शक्ति मिलने के बाद उस शक्ति को किसी सार्वजनिक अच्छे कार्य में इस्तेमाल करनी चाहिए न कि ऐसा दुष्कर्म की वक्त भी श्राप दे डाले |
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हर जीव को अपना कर्म करना चाहिए , फल की कामना नहीं करनी चाहिए इसलिए कि जो भी जीव जैसा कर्म करेगा उसे इस धरती पर वैसा हीं फल मिलना तय है | होलिका के साथ ऐसा हीं हुआ , प्रह्लाद को जलाने के खातिर वह ईश्वरीय शक्ति का इस्तेमाल करना चाहती थी जो ईश्वर की असीम कृपा से नहीं हुआ और उसकी मंशा पर पानी हीं नहीं फिरा बल्कि स्वयं उसे हीं भष्म कर डाला | इसलिए कहा जाता है अच्छे कर्म का नतीजा सदैव अच्छा हीं होता है और बुरे कर्म का नतीजा सदैव बुरा |
इसलिए प्रत्येक इंसान को हर बातें गंभीरता से सोंचनी चाहिए की अगर भला न करे तो किसी का बुरा भी न करे , क्या पता अपने हीं बनाये गए कुएं में कहीं स्वयं न गिरना पड़े |
हिंदी पक्ष से देखा जाये तो फाल्गुन के दिन हीं होलिका दहन होता है और उसके दूसरे दिन "होली" रंगों और मीठे पकवान , भांग की लड्डू व शरबत पीकर मस्त पवन के झोंके से लोग उड़ते नजर आते हैं वह दिन होता है चैत्र का पहला दिवस | कहा जाता है की जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्रचित होकर हिंडोले में झुलते हुए भी पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं तो निश्चय हीं वे वैकुण्ठ लोक में वास करते है | भारत के लगभग सभी प्रदेशो में होलाष्टाका शुरू होने पर पेड़ की शाखा जमीन में गाड़ दिया जाता है और सभी लोग इसके नीचे होलिकात्सव मनाते है |
होलिका दहन बड़ी हीं धूमधाम व रीतीरिवाज से करनी चाहिए | सही मंत्र उच्चारण से पूजा आरम्भ करनी चाहिए साथ हीं परिक्रमा भी | ऐसा करने से अनिष्ठ दूर होता है |
होलिका हेमंत या पतझड़ के अंत की सूचक है और वसंत की काम प्रेममय लीलाओं का दस्तक है | मस्ती भरे गीत , नृत्य , प्यार से छेड़ छाड़ , देवर भाभी का नोक झोंक और सारी नगरी में शोर शराबा जैसे मिलन समारोह का दृश्य दिखा जाता है | जैसे भगवान श्री कन्हैया की होली यानि श्री मुरली रंगस्थली वृन्दावन वैसे हीं ब्रज की होली , मथुरा की होली , काशी की होली ये संपूर्ण नजरिया भारत हीं नहीं विश्व में भी मशहूर है |
लेकिन ! इस ख़ुशी भरे उत्सव में एक बात बहुत हीं दुखदायक महसूस होता है , लोग खुशियाँ तो मानते है और उस दिन कितने सारे जीव की हत्या कर बैठते है अपनी राक्षसी भोजन से तृप्त होने के लिए | महज एक राक्षसी स्वाद , आहार के लिए उन्हें उस जीव के परिवार से जुदा कर देते हैं | मिलन के पर्व में एक जीव के लिए अपने परिवार से जुदाई |
किसी को दुःख न पहुंचे , क्षति न हो | लोग खुशियों के साथ इस त्योहार को मिलजुलकर मनायें , होली ऐसी होनी चाहिए | हसंते को रुलाकर कदापि नहीं बल्कि रोते को हंसाकर व रूठे को मनाकर , तभी यह खुशियाँ मिशाल बनेगी | ..... (फीचर :- भव्याश्री डेस्क)

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